Religion

इस्लाम किसी भी तरह के ब्याज लेने को हराम क्यों ठहराता है?

इस्लाम की शिक्षाओं की बात करें तो हम देखते हैं कि इस्लाम की पाक आसमानी किताब कुरआन मुस्लिमों को आदेश देती है कि वो किसी भी प्रकार का ब्याज न खाएं | ब्याज खाना मुसलमानों के लिए हराम है लेकिन कुरआन ऐसा क्यों आदेश देती? इसके बारे में हम आपको बताते है-

कुरआन ब्याज को हराम क्यों बताती है

हम जब अल्लाह के रसूल मोहम्मद साहब की शिक्षाओं का अधयन्न करते हैं ईसमे २ बातें प्रमुख रूप से देखते हैं कि मोहम्मद साहब ने जो शिक्षाएं दी हैं वो न को किसी व्यक्तिगत देश न ही किसी व्यक्तिगत मजहब के लिए है बल्कि वे पूरी मानवजाति के लिए हैं| दूसरी बात ये  है कि उनकी शिक्षाएं उनके समय जितनी प्रासंगिक थी आज भी उतनी ही हैं|

मोहम्मद साहब ने जीवन के हर पहलू पर बात करते हुए शिक्षाएं दी हैं| अर्थशास्त्र की द्रष्टि से भले ही ब्याज को मूलधन का किराया या शुल्क आदि कुछ भी कहा जाए लेकिन इस्लाम के लिए ये हराम है क्योकि इस्लाम मानता है कि ये  ब्याज एक ऐसी व्यवस्था है जो अमीर को और अमीर व गरीब को और गरीब बनाती है| ये शोषण का एक तरीका भी कह सकते हैं और इससे इन्सान को दूर रहना चाहिए इसीलिए इस्लाम ब्याज को हराम करार देता है|

ब्याज लिए तो ये चीजें हो जाती हैं ख़त्म

कुरआन जब पढोगे तो पाओगे कि उसमे साफ़ साफ़ शब्दों में लिखा कि हे ईमान वालों 2 गुना या ४ गुना करके ब्याज मत खाओ| अल्लाह का खौफ करो| इस्लाम कहता है कि जो लोग ब्याज का पैसा खाते हैं उनके पास बरकत खत्म हो जाती है| मोहम्मद साहब के समय ब्याज की प्रथा अपने चरम पर थी जिससे गरीब बहुत परेशान था और अमीरों की मौज कट रही थी|

कुरआन ये भी कहती है कि ब्याज से अर्जित किये धन से भले ही इन्सान को लगे कि उसके पास धन बढ़ रहा है लेकिन असल में धन उसका कम हो रहा है| ब्याज चूंकि इस्लाम अनुसार बरकत खत्म कर देता है तो इसके चलते आपके पुण्यकर्म भी ख़त्म हो जाते हैं|

कुरआन में ये बात भी साफ़ साफ़ लिखी है कि जिन लोगों ने बात न मानकर ब्याज को ही अपना धंधा बना रखा है या फिर लेने के पीछे बहाने बनाते है तो ये एक किस्म का शैतानी धोखा है| कुरआन कहती है जो ब्याज लेते हैं वो लोग कयामत वाले रोज खड़े नहीं हो पाएंगे| ये  बात भी यहाँ साफ़ कर दें कि अल्लाह की जानिब से व्यापर को वाजिब बताया गया है लेकिन ब्याज हराम ही है|

देखिये वीडियो:-

Source:https://www.patrika.com/story/astrology-and-spirituality/why-interest-is-haram-in-islam-1259.html

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