चमत्कारों से हैरान कर देती है हाजी अली दरगाह

शेयर करें

आज आपको दुनियाभर में ऐसे कई मंदिर-मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थान मिल जाएंगे जिनका करिश्मा दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो.

अगर भारत देश की ही बात करे तो केवल भारत में भी ऐसे बहुत से खूबसूरत धार्मिक जगहें हैं जो अपनी खासियत और खूबसूरती के लिए जानी जाती है.

समुद्र के बीचो-बीच तैरती हैं ये प्रसिद्ध दरगाह

लेकिन दोस्तों आज हम आपको एक ऐसी दरगाह के बारे में बताएँगे जो समुद्र के बीचो-बीच पानी के ऊपर बनी हुई है.

जी हाँ दोस्तों बीच समुंद्र में तैरती ये दरगाह हमेशा से ही दुनियाभर के लोगों की आस्था और जिज्ञासा का केंद्र रही है.

आपने सही पहचाना हम बात कर रहे हैं उस हाजी अली दरगाह की जो मुंबई में वर्ली तट के नज़दीक मौजूद  एक छोटे से टापू पर बनी हुई है.

दुनियाभर में प्रसिद्ध इस दरगाह में मुस्लिम के साथ-साथ हिन्दु भी आकर अपनी दुआओं के पूरा होने की मन्नत मांगते हैं.

हाजी अली की दरगाह का करिश्मा

15 वीं शताब्दी में मुंबई के वरली में स्थित समुद्र के बीचो-बीच बनी ये दरगाह जमीन से कम से कम 500 गज दूर समुंद्र के भीतर बनी है.

सबसे हैरान करने वाली बात इस दरगाह की ये हैं कि समुद्र के बीच में होने के बावजूद भी ये दरगाह डूबता नहीं है.

समंदर से घिरी है ये दरगाह

समुद्र के बीचो-बीच होने के चलते हाजी अली दरगाह तक पहुंचने के लिए लोगों को एक लंबे सीमेंट के बने पुल से होकर गुजरना पड़ता है, जो कि दोनों ही तरफ से समुद्र के घिरा है.

लोगों की पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही कहानियों और दरगाह के ट्रस्टियों की मानें तो पीर हाजी अली शाह पहली बार जब व्यापार करने अपने घर से निकले थे तब उन्होंने मुंबई के वरली के इसी इलाक़े को अपना ठिकाना बनाया था.

मुंबई का वरली था पीर हाजी का ठिकाना

दरगाह के मौलाना बताते हैं कि पीर हाजी यहीं रहते थे और धीरे-धीरे उन्हें ये स्थान अच्छा लगने लगा.

लम्बे समय तक यहाँ रहने के चलते उन्होंने यहीं रहकर अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने की बात सोची.

इसी मकसद के साथ उन्होंने अपनी मां तो खत लिखकर इसकी जानकारी दी और अपनी सारी संपत्ति गरीबों में बांटकर धर्म का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया.

हाजी अली की आखिरी इच्छा

प्रचार करने से पहले हाजी अली हज की यात्रा पर गए, लेकिन कहा जाता हैं कि इस यात्रा के दौरान उनकी मौत हो गयी.

मरने से पहले उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा जताई की मरने के बाद उन्हें दफनाया न जाएं बल्कि उनके कफन को समुद्र में डाल दिया जाए.

समुद्र में नहीं डूबा ताबूत

समर्थकों ने उनकी इस इच्छा को पूरा करते हुए उनके कफ़न को एक बड़े ताबूत में बंद कर समुद्र में डाल दिया.

लेकिन उनका ताबूत अरब सागर से होते हुए मुंबई की उसी जगह पर आकर रुक गया, जहां वो मरने से पहले रहते थे.

1431 में बनीं दरगाह

ऐसे में कहा जाता हैं कि जहां उनका ताबूत रूका उसी जगह पर साल 1431 में उनकी याद में दरगाह बनाई गई.

दुनियाभर में मशहुर और आस्था का केंद्र इस दरगाह की सबसे ज्यादा खास बात ये हैं कि समुद्र में तेज ज्वार के आने के बावजूद भी डूबना तो छोड़िये इस दरगाह के भीतर समुद्र के पानी की एक बूंद भी नहीं जाती है.

और ऐसा आज से नहीं बल्की सालों से होता आ रहा है. जो वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है.


शेयर करें

अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट में छोड़े