शिवपाल ने फिर मचाया यूपी की राजनीति मे हड़कंप, राजनीती गरम

शेयर करें

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही उत्तर प्रदेश मानों हिंदुत्ववादी राजनीति की प्रयोगशाला सा बन गया है। यूं तो इस चुनाव में मोदी की सुनामी चल रही थी लेकिन यूपी का परिणाम तो वाकई आश्चर्यजनक था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि यूपी की राजनीति में हाशिये पर पड़ी भारतीय जनता पार्टी को इतनी शानदार सफलता हाथ लगेगी।

1. लोकसभा की तरह विधानसभा में भी प्रदर्शन

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और अपना दल के बीच गठबंधन हुआ था। कुल 80 सीटों में से जहां बीजेपी को अकेले 71 और अपना दल को 02 लोकसभा सीट पर सफलता मिली थी। वहीं समाजवादी पार्टी को 05 और कांग्रेस को 02 सीटों से  ही संतोष करना

पड़ा था। बसपा का तो खाता भी नहीं खुल पाया था। विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने अपनी सफलता को दोहराया और 325 सीटों पर जीत हासिल कर ली।

2. शिवपाल में कितना दम

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा और मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने सपा से नाता तोड़ कर अलग रुख अपना लिया है। काफी समय से चले आ रहे मनमुटाव के बीच शिवपाल ने अंततः अपना नया रास्ता देख लिया।

उन्होंने समाजवादी सेकुलर मोर्चा के नाम से नए राजनीतिक दल की घोषणा कर दी है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस मोर्चे में सपा के तमाम विक्षुब्ध और उपेक्षित नेता शामिल हो सकते हैं।

3. यादव वोट में सेंधमारी की कोशिश

नए दल के गठन के बाद शिवपाल की सबसे ज्यादा कोशिश यादव वोट बैंक को अपने पाले में लाना होगा। सारे वोट न भी आए तो कुछ हिस्सा तो आ ही जाए। शिवपाल की कोशिश खुद के जीतने से ज़्यादा अखिलेश को हरवाने की होगी। सेकुलर मोर्चा नाम रखने के पीछे कोशिश मुस्लिम वोटरों को साधने की होगी।

4. ओवैसी से कर सकते हैं गठबंधन

यूपी में अपनी जड़ जमाने की कोशिश में लगे आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन के सदर और सांसद असदुद्दीन ओवैसी को शिवपाल के रूप में एक नया साथी मिल सकता है। अगर ये दोनों एक साथ आकर चुनाव लड़ते हैं

तो एम वाई समीकरण में जबरदस्त सेंधमारी की उम्मीदें हैं। भाजपा के लिए जहां यह फायदेमंद होगा तो वहीं सपा बसपा गठबंधन को तमाम कोशिशों के बावजूद लेने के देने पड़ सकते हैं।

5. अखिलेश ने रुकवाई कांग्रेस में एंट्री

दरअसल शिवपाल सिंह यादव बागी होने के बाद कांग्रेस में जाने को इच्छुक थें। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से उनकी 02 राउंड बात भी हो चली थी लेकिन ऐन मौके पर अखिलेश यादव ने लंगड़ी मार दी। उन्होंने राहुल गांधी से बात कर कांग्रेस में उनकी एंट्री रुकवा दी।

निष्कर्ष :

अखिलेश वाकई में भाजपा को हराने को लेकर गम्भीर हैं तो महत्वाकांक्षा त्याग किसी तरह अपने चाचा को मैनेज करें।


शेयर करें

अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट में छोड़े