राहुल गाँधी से मिलने को तरस रहा दलबदलू नितीश, राहुल ने नहीं दिया वक़्त… पढ़ें पूरी खबर

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बिहार के मुख्यमंत्री एवं जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की राजनीति भी बड़ी अजीब है। कब किसके साथ हो जाएंगे, कब किसके विरोध में हो जाएंगे, कोई नहीं जानता।

जिसके साथ रहते हैं, उनका विरोध करते हैं और जिनके विरोध में रहते हैं, उनके साथ मौके बेमौके खड़े हो जाते हैं। इससे कयासों का दौर शुरू हो जाता है।

 

04 साल में 04 गठबंधन

 

नीतीश कुमार ने पाला बदलने में देश के सभी पुराने नेताओं का रिकॉर्ड तोड़ कर रख दिया है।

वो कब, कहां किसके साथ गठबंधन कर लेंगे और गठबंधन तोड़ लेंगे, ये कोई नहीं जानता।

नीतीश कुमार 2013 में बीजेपी के साथ थें, 2014 में सीपीआई के साथ हुए, 2015 में राजद के साथ थें और 2017 में भाजपा, लोजपा, रालोसपा के साथ चले गए।

कांग्रेस को दे सकते हैं समर्थन, राहुल से मांग रहे समय

खबरें ये हैं की नितीश कुमार राहुल गाँधी से समय मांग रहे हैं, लेकिन राहुल नितीश को समय देने को तैयार नहीं, नितीश ने सोनिया गाँधी को भी संपर्क करने की कोशिस की परन्तु सोनिया भी अब नितीश पर भरोसा नहीं कर रहीं, ऐसे में नितीश पर यह बहुत बड़ा संकट सा आ गया है |

कुछ अन्दर की खबरें तो ये भी हैं की राहुल गाँधी ने नितीश से मिलने से मना कर दिया है |

प्रणब मुखर्जी को दिया था समर्थन

 

जब नीतीश कुमार पहले एनडीए के दूसरे सबसे बड़े सहयोगी हुआ करते थें।

उस दौर में कांग्रेस की ओर से प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थें जबकि एनडीए की ओर से पीए संगमा दावेदारी पेश कर रहे थें। नीतीश ने सबको चौंकाते हुए संगमा का विरोध किया और प्रणब को समर्थन का ऐलान कर दिया।

बीजेपी उनके इस निर्णय से चकित हो गई थी। उन्हें यकीन नहीं था कि नीतीश कुमार इस तरह से गठबंधन की गांठ खोल कर रख देंगे।

यूपीए के साथ धोखा

2015 में राजद कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले नीतीश कुमार की पार्टी दूसरे नम्बर पर आई, फिर भी पहले नम्बर की पार्टी राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को ही बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार किया लेकिन फिर भी नीतीश नहीं पसीजे।

मौका देख कर चौका मार दिया और फिर से भाजपा की गोद में जाकर विराजमान हो गए।

खो दी अपनी विश्वसनीयत

 

ये वही नीतीश कुमार थें, जिन्हें एक दौर में विपक्षी दलों के गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद का सक्षम एवं सशक्त उम्मीदवार समझा जाता था।

बार बार पाला बदलने की वजह से वो धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील राजनीति के समर्थक मतदाताओं की नज़र में गिर गए। कभी विकास पुरुष की छवि रखने वाले नीतीश दलबदलू की संज्ञा से विभूषित होने लगें।

बिहार में कर रहे सत्ता विरोधी लहर का सामना

 

नीतीश कुमार जिस बिहार में पूजे जाते थें, आज वहां पब्लिक उनसे काफी गुस्से में है।

2020 के विधानसभा चुनाव के इतना पहले से ही सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है।

अररिया, जहानाबाद और जोकीहाट में राजद ने जदयू को बुरी तरह परास्त कर दिया।

निष्कर्ष :

राजनीति में विश्वसनीयता से बढ़ कर कोई पूंजी नहीं होती और नीतीश कुमार ने इसे खो दिया है।


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