खत्म हुआ नीतीश का राजनीतिक कैरियर, अस्तित्व बचाने को कर रहे संघर्ष,पढ़ें

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भारतीय राजनीति और खास तौर पर बिहार के राजनीतिक पटल पर काफी दिनों तक उदयमान सूर्य की तरफ चमकने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने कैरियर के अंतिम पड़ाव पर हैं. एक तो बिहार में 15 सालों का सत्ता विरोधी रुझान और बार बार पाला बदलने से उनकी विश्वसनीयता पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है.

नीतीश कुमार की हालत सांप और छूछूंदर वाली हो चुकी है. एनडीए हो या यूपीए किसी को भी अब नीतीश पर भरोसा नहीं रहा. एक दौर वह भी था कि बिहार में महागठबंधन की जीत के बाद उन्हें पीएम के संभावित दावेदारों में गिना जाने लगा था.

1. चार साल में चार सरकार

नीतीश कुमार की राजनीतिक वफादारी पूरी तरह से संदिग्ध हो चुकी है. उन्होंने चार सालों में बिहार को चार सरकार देने का रिकॉर्ड बना दिया है. 2013 में वह भाजपा के साथ सरकार चला रहे थें.

2014 में उन्होंने माले के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ा. 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. 2017 में एक बार फिर से पल्टी मारते हुए नीतीश भाजपा, लोजपा और रालोसपा के साथ चले गए.

2. भाजपा बार बार करती है बेइज्जत

जदयू के एनडीए में शामिल होने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ लेकिन उसमें जदयू को शामिल नहीं किया गया. सार्वजनिक तौर पर नीतीश ने पीएम मोदी ने पटना यूनिवसिर्टी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की मांग की, मोदी ने मंच से ही इसे खारिज कर दिया. विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग पहले हीं केंद्र ने ठुकरा दी है.

निष्कर्ष : राजनीति में विश्वसनीयता सबसे बड़ी चीज है. नीतीश कुमार इसे खो चुके हैं.


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