देश के सभी धार्मिक समुदायों में से मुसलमान सबसे ज़्यादा गरीब क्यों हैं? असल वजह हैरान कर देगी - वायरल इन इंडिया - Viral in India - NEWS, POLITICS, NARENDRA MODI

देश के सभी धार्मिक समुदायों में से मुसलमान सबसे ज़्यादा गरीब क्यों हैं? असल वजह हैरान कर देगी

रमजान हो या फिर ईद..देश-विदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में बाजारों की रौनक देखते ही बनती है. मुस्लिमों के पर्वों पर इन इलाकों में लगभग रातभर सभी बाजार खुलते हैं. अगर भारत की ही बात करे तो यहाँ भी मुसलामानों की ऐसी ही तस्वीरे सामने आती है. लेकिन हैरानी की बात तब लगती है जब 10 साल पहले सच्चर कमेटी की वो बात याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है.

रोजगार के मामले में सबसे ज्यादा मुस्लिम सामाज ही है बेरोजगार

भारत की जनसंख्या के 2011 के आकड़ों पर नज़र डाले तो उसमें पता चलता है कि मुसलमान रोजगार के मामले में देश के अन्य धार्मिक समुदायों में सबसे ज्यादा पीछे हैं. देश में महज 33 फीसदी मुसलमानों के पास ही रोजगार है, इसके साथ ही जैन और सिख समुदायों के लगभग 36 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है. वहीं अगर हिंदू समुदाय के आकड़ों को देखे तो उनमें 41 फीसदी और बौद्ध समुदाय के 43 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

हर 4 में से देश का 1 मुसलमान है गरीब

इसी मामले को लेकर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने एक अध्ययन किया जिसमें उन्होंने माना कि…

“प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान गरीब है. देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं. उनकी स्थिति दलितों और आदिवासियों के मुकाबले थोड़ा बेहतर है.”

मुसलिम वर्ग की सालाना आय है दुसरे धर्मों के मुकाबले बेहद कम 

इसी के साथ एक सर्वे के मुताबिक, देश में एक औसत मुस्लिम परिवार की सालाना आमदनी 28,500 रुपये आंकी गई. जो दलित और आदिवासियों के मुकाबले बस थोड़ी-सी ही ज्यादा है.

मुस्लिम समुदाय की गरीबी बेहद धीमी रफ़्तार से हो रही है कम

2004-05 के मुकाबले 2009-10 के एक सर्वे में जहां हिंदू समुदाय की कुल गरीबी लगभग 52 फीसदी की रफ्तार से कम हुई तो वहीं मुस्लिम समुदाय में इसकी रफ्तार सिर्फ 39 फीसदी देखी गई है.

हर 4 में से 1 बच्चें ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा 

अगर सरकारी आकड़ों पर ही गौर किया जाए तो ये देखा गया है कि देश के पूरे मुस्लिम समुदाय के विकास पर गरीबी की वजह से प्रतिकूल असर पड़ रहा है. इसी के चलते मुस्लिस समुदाय में सबसे ज्यादा 3 फीसदी बाल मजदूर पाए जाते हैं. जिसमें ये भी देखा गया कि 6 से 17 साल की उम्र के 28.8 फीसदी बच्चों ने अभी तक स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है.

अपने लिए क्‍या कर रहा है मुस्‍ल‍िम समुदाय?

मुस्लिम समाज में हर साल अल्लाह के नाम पर हजारों करोड़ रुपये का दान निकलता है जिसे जकात कहते है. ये जकात देश के बड़े-बड़े रहीस मुसलमान अपने सामाज की गरीबी कम करने के लिए दान में देते है, लेकिन हैरानी की बात है कि ये ज़कात भी भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाती है.

जी हाँ मुंबई के ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ मुस्‍ल‍िम इकोनॉमिक अपलिफ्टमेंट से जुड़े डॉ. रहमतुल्ला कि माने तो..

“देशभर में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात निकलती है. लेकिन जकात की बड़ी रकम गरीब मुसलमानों तक पहुंचने की बजाय जकात माफियाओं के पेट में चली जाती है. जकात निकालने वाले अमीर मुसलमान खुश होते हैं कि उन्होंने ऐसा करके अपना फर्ज पूरा कर दिया. लेकिन हकीकत ये है कि देशभर में मदरसों से जुड़े लोग यतीम बच्चों के नाम जकात इकट्ठा करके ले जाते हैं. बाद में यही पैसे यतीम बच्चों से अपने नाम कराकर उसे अपनी निजी संपत्ति में जोड़ लेते हैं.” 

कुछ लोग अपने फ़ायदे के लिए गरीब मुसलमानों को बरगला रहे हैं

इसी के साथ ये भी देखा गया है कि कुछ धर्म के ठेकेदारों ने मासूम मुसलमानों के दिमाग में ये ग़लतफ़हमी डाल दी है कि जकात के पैसे का इस्तेमाल सिर्फ दीनी तालीम हासिल करने वाले यतीम बच्चों की परवरिश और उनकी तालीम पर ही होना चाहिए. जो कि बिलकुल ग़लत है.

जकात का असल मकसद क्‍या है?

इस्लाम के जानकारों की माने तो कुरान भी मुसलमानों को अपने समाज के कमजोर तबकों की मदद का आदेश देता है. सूराः अल-बकर की आयत नं. 177 में इस बात का उल्लेख करते हुए साफ़ तौर पर कहा गया है कि..

नेकी यह नहीं है कि तुम अपने मुंह पूरब या पश्चिम की तरफ कर लो. बल्कि नेकी तो यह है कि ईमान लाओ अल्लाह पर और कयामत के दिन पर और फरिश्तों पर, किताबों पर और पैगंबरों पर. अपने कमाए हुए धन से स्वाभाविक मोह होते हुए भी उसमें से अल्लाह के प्रेम में, रिश्तेदारों, अनाथों, मुहताजों और मुसाफिरों को और मांगने वालों को दो और गर्दन छुड़ाने में खर्च करो. नमाज स्थापित करो और जकात दो. जब कोई वादा करो, तो पूरा करो. मुश्किल समय, कष्ट, विपत्ति और युद्ध के समय में सब्र करें. यही लोग हैं, जो सच्चे निकले और यही लोग डर रखने वाले हैं.”

निष्कर्ष

गौरतलब है कि जब भी भारत का हर एक अमीर मुसलमान अपनी जकात को बेहद ईमानदारी से सही लोगों तक पहुंचाएगा, तो आकड़ों के अनुसार कुछ ही दशकों में मुस्लिम समाज की गरीबी देश से दूर हो सकती है. जिससे देश में गरीबी का ग्राफ भी खुद-बा-खुद नीचे लाने में मदद मिलेगी.

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