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गौ माता भारत में आस्था का प्रतीक हैं. गाय के दूध के महत्व को देखते हुए प्राचीन काल से हीं ऋषियों, मनीषियों ने इसे माता का दर्जा दिया ताकी लोग पवित्र समझ कर इसका संरक्षण करें लेकिन आज हालात यह है कि गाय माता के नाम पर देश भर में हिंसा हो रही है. गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग हो रही है.

गाय की कीमत ज्यादा और इंसान के जान की कीमत कम हो गई है. देश गाय के नाम पर ऐसे सैकड़ों उत्पात अभी तक झेल चुका है. इसके सबसे ज्यादा शिकार दलित और मुसलमान हो रहे हैं.

1. गौ तस्करी में पकड़े गए तीन लोग

मामला पश्चिम बंगाल के मालदा का है. भारत बांग्लादेश सीमा के आदमपुर इलाके से तीन गाय तस्करों को पकड़ा गया है जो भारत से बांग्लादेश इन गायों की ले जा रहे थें. तीनों आरोपियों का नाम आलोक चौधरी, रामू चौधरी और गया चौधरी है. तीनों गिरफ्तार तस्करों को स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया गया है.

2. बाढ़ की आड़ में तस्करी


बीएसएफ ने बताया कि इस इलाके से होकर महानंदा नदी गुजरती है. महानंदा का जलस्तर इस मौसम में काफी बढ़ जाता है. महानंदा के पार करते हीं बांग्लादेश की सीमा शुरु हो जाती है. इसी बाढ़ का फायदा उठाते हुए इस पार से उस पार तस्करी तेज हो जाती है.

हालांकि नदी पार करना काफी जोखिम भरा होता है फिर भी पैसे के लिए लोग खतरा मोल लेने से नहीं हिचकतें.बीएसएफ अधिकारियों के अनुसार तीनों गिरफ्तार लोग आदमपुर के छोटपुर इलाके से गुजरने वाली महानंदा के दोनों तरफ से जुगाड़ बांध कर इधर से उधर ले जा रहे थें.

गायों को केला के थंभ की रस्सी से बांधा जा रहा था कि अचानक उनकी नजर पड़ गई. पहले तो उन्होंने भागने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सके. बीएसएफ ने वहां से 28 गायों को जब्त किया. उन्हें पास के हीं गौशाले में भेज दिया गया है.

3. मध्य प्रदेश से भी हुई गिरफ्तारी

कल हीं ऐसी एक और घटना मध्य प्रदेश में हुई. यहां गायों को काटने के लिए अवैध रुप से ट्रकों में भरकर छतरपुर से कहीं और ले जाया जा रहा था. इसकी भनक पुलिस को मिल गई. यहां के हतना गांव में पुलिस ने छापेमारी की तीन लोगों को गिरफ्तार किया. अशोक शुक्ला धंधे का मास्टरमाइंड है जबकि तस्करी का काम गांव के हीं लच्छू अहिरवार और लाखन अहिरवार करते हैं

निष्कर्ष :

आज की दुनिया में पैसा हीं सबसे बलवान है. पैसे के लिए कोई भी कुछ भी काम करने को आतुर हो जाता है. गाय की तस्करी में भी कुछ ऐसा हीं है. इनमें कई जाति धर्म के लोग शामिल हैं लेकिन हिंदुवादी संगठनों के निशाने पर सिर्फ दलित और मुसलमान हैं.

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