60 से 62,000 रूपए की बिक रही खटिया, लोग खरीदने के लिए लाइन में लग रहे

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हमारे यहां शुरु से ही कहा जाता है कि हम खुद को प्रकृति के जितना करीब रखते हैं उतना हम शारीरिक रुप से स्वस्थ रहते हैं। ऐसा न केवल हमारे बूजुर्गों ने कहा है बल्कि आयुर्वेद में भी ऐसे कई तथ्य हैं जो हमें प्रकृति से जुड़े रहने की सलाह देते हैं।

प्राकृतिक चीजों में ही जुड़ें हैं स्वास्थ्य के कई लाभ

आप नेचुरल चीजों के जितना करीब रहते हैं उतना ही आप बीमारियों से दूर रहते हैं। आज भले ही बाजार में कई मॉडर्न चीजें आ गई हैं लेकिन जो लाभ आपको अपनी मिट्टी से मिल सकते हैं वह सब आपको इस मॉडर्न लाइफस्टाइल में नहीं मिल सकते।

आज हम आपको ऐसी ही एक खास चीज के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे वक्त के साथ शायद हम भूल गए हैं, लेकिन इसके सेहत को इससे होने वाले लाभ आज भी कम नहीं हुए है।

ऑस्ट्रेलिया में भारत की देसी खटिया बेची जा रही है 62 हजार रुपये में

ऑस्ट्रेलिया में डेनियल नाम का एक आदमी जो कि भारत की देसी खटिया को 990 ऑस्ट्रेलियन डॉलर की कीमत पर बेच रहा है भारतीय मुद्रा के हिसाब से यह 62 हजार रुपये है। सोचने वाली बात है इस कीमत की और हमारे यहां इस खटिया को ऑफ फैशन समझ कर इसे इस्तेमाल न करने की।

फैशन के आगे खटिया के फायदे हैं कई ज्यादा गौर करने वाले

सोने के लिए खटिया हमारे बुजूर्गों के समय से इस्तेमाल होती आ रही है और यह हमारे पूर्वजों द्वारा खोजी गई है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नही आता होगा? वो भी लकडी चीरने के बाद उसकी पट्टीयां बना कर डबल बैड बना सकते थे। बैड बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है जिसमें लकड़ी की पट्टियों पर कुछ कीलें ही तो ठोकनी होती है।

वहीं खटिया बनाने के लिए भी किसी रॉकेट साइंस की जरुरत नहीं लेकिन यह एक समझदारी है जिससे शरीर को बैड के मुकाबले ज्यादा आराम मिल सकता है। खटिया बनाना एक कला है उस रस्सी को बुनना पड़ता है और मेहनत नहीं बल्कि दिमाग की जरुरत होती है।

खटिया में सोने से शारीरिक रुप से होते हैं कई लाभ

इस खटिया में जब हम सोते हैं तब माथा और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है क्योंकि रात हो या दोपहर लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते थे। पेट को पाचनक्रिया के लिए ज्यादा खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय खटिया की झोली ही इस प्रक्रिया में फायदेमंद होती है।

आज आप किसी भी आरामकुर्सियों को देख लें उसमें भी खटिया की तरह झोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपड़े की जोली का ही होता था, लकड़ी को सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। खटिया पर सोने से कमर का दर्द और सांधे के दर्द की परेशानी नहीं होती है।

खटिया के इस्तेमाल से हैं फायदें

आप गौर करें तो डबलबैड के नीचे अंधेरा होता है, जिसमें कई तरह की बीमारी फैलाने वाले किटाणु पनपते है, यह वजन में भारी होता है तो रोज रोज इसकी सफाई भी नहीं की जा सकती। खटिया को रोज सुबह खड़ा कर अच्छे से सफाई भी हो जाती है और इसे धूप लगाकर बाकी के किटाणुओं को भी दूर किया जा सकता है।

हमारे किसानो के लिए भी खटिया बनाना बहुत आसान और सस्ता होता है, मिस्त्री को थोड़ी उनकी मेहनत ही देनी होती है। कपास खुद का होता है तो खुद रस्सी बनाई जा सकती हैं और खटिया खुद बुन लेते हैं। लकड़ी किसानों की अपनी होती है। अन्य को लेना हो तो भी ज्यादा महंगी नहीं होती।

हां, कपास की रस्सी के बदले नारियल की रस्सी से काम चलाना पड़ता है आज की तारीख में कपास की रस्सी महंगी हो गई है। सस्ते प्लास्टिक की रस्सी और पट्टी भी आज मौजूद है लेकिन वो सही नही होती। बेहतर है कि आप दो हजार की खटिया के बदले हजारों रूपए की दवा और डॉक्टर का खर्च बचाएं और देसी खाट का इस्तेमाल करें।


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