नजीब के नाम पर झूठी अफ़वाह फैलाते पकड़ा गया टाइम्स ऑफ़ इंडिया

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अपने पुराने नाम और पोजिशन का इस्तेमाल करते हुए हमारे देश के कई ऐसे मीडिया संस्थान हैं जो लगातार फर्जी खबरों का कारोबार चला रहे हैं. कहने को तो इनके नाम बहुत बड़े हैं पर दर्शन छोटे हैं.

कई सड़क छाप अखबारनवीसों को पकड़क कर इन्होंने पत्रकार का तमगा दे दिया है, हालांकि इनका सिर्फ एक हीं काम है किसी तरह सनसनी फैलाओं और देश भर में एक समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहा है.

1. झूठी खबरें फैलाता है टाइम्स ऑफ इंडिया

देश की गोदी मीडिया की फेहरिश्त में अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया भी शामिल है. किसने कहने पर ये झूठी खबरों का बाजार चला रहा है.

इसके पीछे कौन लोग हैं जो नजीब जैसे छात्र नेताओं को आईएसआईएस से संबंध की खबरें पब्लिश कराते हैं.  कहीं इसके पीछे भारत तोड़ने वाली ताकतें तो नहीं लगीं हुई है.

2. होनी चाहिए टाइम्स ऑफ इंडिया की जांच

कहीं ऐसा तो नहीं कि टाइम्स ऑफ इंडिया के पीछे देश के दुश्मनों का समर्थन है जो हर कीमत पर भारत के हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार पैदा कर देश के टुकड़े करना चाहते हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की फंडिंग की जांच होनी चाहिए. कौन हैं इनके पीछे और किस कारण से ये अंग्रेजी अखबार झूठी और फर्जी खबरें छाप रहा है.

3. क्या हुआ था नजीब प्रकरण में

नजीब अहमद देश की राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी का छात्र था. किसी विषय को लेकर उसके आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी के सदस्यों के साथ कहासुनी हो गई थी. उसके बाद से नजीब अहमद अपने हॉस्टल से 15 अक्टूबर 2016 से गायब है.

इस नजीब को टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने आकाओं के इशारे पर आईएसआईएस से संबंध रखने की खबर छाप दी थी. यह स्टोरी टाइम्स ऑफ इंडिया के 21 मार्च 2017 को मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी.

4. टाइम्स के मुंह पर दिल्ली पुलिस ने मारा तमाचा

टाइम्स ऑफ इंडिया में नजीब के आईएसआईएस से संबध बताने के बाद काफी लोगों ने इस खबर को शेयर और रिट्वीट कर दिया. ऐसा करने वालों में आरएसएस और भाजपा से जुड़े काफी बड़े चेहरे भी थें.

बाद में दिल्ली पुलिस ने टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर को पूरी तरह से झूठ, फर्जी और नकली करार दिया. देश भर में लोगों ने टाइम्स ऑफ इंडिया पर अपना खूब गुस्सा निकाला.

निष्कर्ष :

टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे फर्जी खबर चलाने वाले अखबारों का लाइसेंस रद्द कर दिया जाना चाहिए और इसके मालिक और पत्रकारों को जेल में ठूंस कर नंगा कर पिछवाडे में डंडा घुसेड़ कर ऐसी खबरों का सोर्स पूछना चाहिए और नहीं बताने पर कड़ी से कडी सजा सुनाई जानी चाहिए. ऐसे दो कौड़ी के अखबारों को सबक जरुर सिखाना चाहिए नहीं तो यह देश को दंगे की आग में झुलसा देंगें.


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