2012 ने जब कांग्रेस तब सुधीर का ट्वीट पढोगे तो खून खौल जायेगा

शेयर करें

महंगाई डॉ मनमोहन सिंह के राज में डायन हुआ करती थी, जो नरेंद्र मोदी के राज में डार्लिंग सी हो गई है। आपको याद होगा जब कांग्रेस की सरकार में पेट्रोल डीजल की कीमतों में ज़रा सी भी बढ़ोतरी होती थी तो पूरी भाजपा और विपक्ष सड़क पर उतर कर नागिन डांस करने लगते थें, और आज कमरतोड़ महंगाई पर सब मौन धारण किए हुए है।

1. गोदी मीडिया में कोई हलचल नहीं

यूपीए सरकार में 50 पैसे की कीमत बढ़ते ही न्यूज़ चैनलों पर नकारात्मक खबरों की बाढ़ सी आ जाती थी। सोशल मीडिया पेट्रोल डीजल से सम्बंधित चुटकुलों और व्यंग्य से भरा रहता था। दिन भर इसी खबर को मिर्च मसाले लगा कर सुनाया जाता था। वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों को भी मनमोहन सरकार की नाकामी के तौर पर दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जाती थी।

2. बाइक में लगा दो आग

भारतीय गोदी मीडिया के सबसे बड़े महानायक सुधीर चौधरी को तो आप जानते ही होंगे। ज़ी न्यूज़ जैसे सर्वाधिक ‘ निष्पक्ष ‘  चैनल पर देश का डीएनए खंगालते नज़र आ जाते हैं। इन्होंने 2012 में पेट्रोल डीजल की कीमतों पर यूपीए सरकार के खिलाफ संग्राम छेड़ रखा था। विरोध प्रदर्शन प्रायोजित हुआ करते थें। बाइक को आग के हवाले कर दिन भर खबरें दिखाई जाती थी।

3. सुधीर चौधरी का भड़काऊ ट्वीट

2012 में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई आंशिक वृद्धि के मुद्दे पर मनमोहन सरकार पर प्रहार करते हुए ज़ी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर व्यंग्यात्मक लेख लिखते हुए कहा कि पेट्रोल पंप पर अटेंडेंट ने बाइक वाले से पूछा कि कितने का डाल दूं। इस पर बाइक सवार ने कहा कि 2- 4 रुपये का पेट्रोल बाइक पर स्प्रे कर दे, आग लगानी है।

4. पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों ने मचाया हाहाकार

आज की तारीख में देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में जैसे आग सी लग गई है। सरकार ने ऐसी नीति बना दी है कि हर दिन पेट्रोल डीजल की कीमतों की समीक्षा होगी और उस हिसाब से मूल्य निर्धारण होगा। पिछले 08 महीनों से इस नीति के चक्कर में लगातार दाम बढ़ते जा रहे हैं। कभी कभार 50 पैसे कीमत कम हो जाती है तो उसके बाद 05 रुपये प्रति लीटर की बढोत्तरी हो जाती है।

निष्कर्ष :

वक़्त करीब आ गया है जब देश की जनता को सुधीर चौधरी जैसे पत्रकारों का डीएनए उजागर करना शुरू कर देना चाहिए। पत्रकारिता तो निष्पक्ष होनी ही चाहिए। ये सवाल लोकतंत्र की अस्मिता से जुड़ा हुआ है।


शेयर करें

अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट में छोड़े