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कहानी एक ऐसे ठग की जो दोषी होते हुए भी सबकी नजरो में सम्मानित रहा | खुद को रोबिन हुड कहने वाला नटवर लाल हिन्दुस्तान में अब तक का सबसे बड़ा ठग साबित हुआ जिसे पुलिस भी कभी नही पकड़ पायी | नटवर लाल में एक गज़ब का आत्मविश्वास और बात करने की कला थी |

इतना ही नही कोर्ट में जज को नटवर लाल ने एक बार कहा था की ‘जज साब अगर आप थोड़ी देर और मुझसे बात करते है तो आप वही सजा सुनायेंगे जो मैं चाहूँगा’| ये नटवर लाल की ही कला थी जो वो तीन बार आगरा का ताजमहल, दो बार लाल किला और एक बार राष्ट्रपति भवन को बेच दिया था।

नटवर लाल का असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था जो कभी वकील हुआ करता था | लेकिन वकालत से ज्यदा उसका ध्यान ठगी जैसे कामो में चलता था | बताया जाता है कि मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव ने अपने जीवन काल में पुलिस से बचने के लिये 56 नाम रखे थे लेकिन लोग उन्हें नटवर के नाम से ही जानते है | ठगी के किस्सों में घुसने से पहले चलते है उनकी निजी जिंदगी के पहलुओ पे |

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव से नटवर लाल बनने की शुरुवात ?

हर किसी के जीवन में एक ऐसा पल ज़रूर आता है जो व्यक्ति को हमेशा के लिए बदल देता है | बिहार का जन्मा नटवर लाल उर्फ़ मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव पहले पटवारी की नौकरी करता था | क्योंकि उसने वकालत भी कर रखी थी जिससे उसे अंग्रेजी का भी ज्ञान था पर उसका मन कभी भी इन नौकरियों में नहीं लगा | नटवर लाल की शादी भी हुई थी लेकिन शादी के कुछ साल बाद पत्नी का देहांत हो गया था और नटवर अपने जीवन में अकेला रह गया था | इसके बाद नटवर ने हेराफेरी, चार सौ बीसी, ठगी का रास्ता अपनाया और कभी पीछे मुड कर नही देखा |

आम आदमी से लेकर राष्ट्रपति तक के हस्ताक्षर करने में था माहिर

अपनी बात करने की कला के साथ साथ नटवर लाल नकली लेकिन हुबहू हस्ताक्षर करने में भी माहिर था | बताया जाता है की एक बार उसके गाँव में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आये थे। वह नटवर ने उन्हें उनके हुबहू हस्ताक्षर कर के दिखाए थे जिस वजह सब चौक गये | और यही से नटवर लाल ठगी की दुनिया में कदम रखता है | पहली तःगी उसने अपने पडोसी के साथ की थी | उसने अपने पडौसी के चेक पर नकली साइन कर 1000 रूपये निकाल लिये |

ठगी की कहानियो में सबसे ज्यादा मशहूर ताजमहल, लाल किला और राष्ट्रपति भवन को बेचा जाना

तीन बार ताजमहल, दो बार लाल किला और एक बार राष्ट्रपति भवन को बेच चुका है नटवर लाल और यही किस्सा हिंदुस्तान के इतिहास में गढ़ चूका है | बताया जाता कि नटवर लाल  ने  राष्ट्रपति के नकली हस्ताक्षर कर इन इमारतों को बेच दिया था। नटवर लाल ने सरकार को ही नहीं बल्कि कई उद्योगपतियों को भी ठगा था। उसने सबसे ज्यादा सरकारी कर्मचारी और मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों को निशाना बनाया था।

नटवर लाल पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में ठगी के 100 से ज्यादा मामले दर्ज थे। इन राज्यों की पुलिस ने मिथिलेश पर ईनाम घोषित कर रखा था।  अपने जीवनकाल में नटवर लाल 9 बार पकड़ा गया था, और सिर्फ 11 साल ही जेल में रहा। ठगी के 30 मामलों में तो उसे सजा ही नहीं मिल पाई थी।

नटवर लाल ने पुलिस को कुछ इस कदर चकमा दिया की आज तक पुलिस के पास उसका कोई रिकॉर्ड नही है

नटवर लाल एक कम्पलीट पैकेज था क्योंकि पुलिस उसे आजतक नही तलाश कर पायी | हुआ यू था की एक बार ठगी के एक मामले में नटवर लाल को दिल्ली की तिहाड जेल से कानपुर पेशी पर ले जाया जा रहा था। इस दौरान उसके साथ उत्तर प्रदेश पुलिस के दो सिपाही और एक हवलदार थे। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ थी। नटवर लाल की उम्र उस वक्त 75 साल थी।

वह बैंच पर बैठा-बैठा हाफ रहा था। उसने यूपी पुलिस के जवान से कहा कि बेटा मेरा शरीर हाफ रहा है,  बाहर से दवाई लाकर मुझे दे दो, जब मेरे रिश्तेदार मिलने के लिये आयेंगे तो तुम्हारे पैसे वापस दे दूंगा। इसके बाद जवान दवाई लेने के लिये चला गया। नटवर लाल के पास अब दो पुलिस वाले बचे थे। इनमें से एक पुलिस वाले को नटवर लाल ने पानी लेने के लिये भेज दिया। अब सिर्फ हवलदार बचा था।

हवलदार को नटवर लाल ने कहा कि बेटा मुझे बाथरूम जाना है। यहां भीड़ ज्यादा है और मुझे चलने में परेशानी हो रही है। तुम रस्सी पकडे मेरे साथ चलोगे तो लोग मुझे रास्ता दे देंगे। इसके बाद मिथिलेश उर्फ नटवर लाल ने भीड़ का फायदा उठाते हुये कब रस्सी खोली और कब गायब हो गया पता ही नहीं चला।

खुद को गरीबो का मसीहा मानता था नटवर लाल

वो भले ही कानून और समाज की नजरो में आरोपी था लेकिन आज उसका नाम शिद्दत से लिया जाता है | नटवर खुद को रोबिन हुड कहता था और ठगी के पैसो को गरीबो में बाट देने का दावा भी करता था | नटवर लाल को अपने किये पर कोई मलाल नहीं था।

वह कहता था कि मैंने कभी हथियार या मार पिटाई का सहारा नहीं लिया। लोगों से बहाने बनाकर रूपयें मांगे, और लोगों ने दिये। इसमें मेरा क्या कसूर है। नटवर लाल में इतना आत्मविश्वास था कि एक बार उसने कोर्ट में जज से कहा कि जज साहब मेरे बात करने का तरीका ही अनोखा है अगर आप मुझसे 10 मिनट बात कर लेंगे तो आप वहीं फैसला सुनाऐंगे जो मैं कहूंगा।

खुद मौत भी नटवर लाल को कभी ढूंढ ना पाई


नटवर लाल भारत के अलग-अलग जगहों पर अपनी पहचान छुपाकर फरारी काटता था। अन्तिम बार उसे बिहार के दरभंगा रेलवे स्टेशन पर देखा गया था। जहां एक पुलिस वाले ने उसे पहचान लिया था। वह पुलिस वाला उसे बचपन से जानता था नटवर लाल भी समझ गया था कि उसे पहचान लिया गया है। जब तक पुलिस वाले उसके पास पहुंचते तब तक वह फरार हो चुका था। बताया जाता है पास ही खडी मालगाड़ी के डिब्बे में नटवर लाल के कपडे मिले और गार्ड की यूनीफॉर्म गायब थी।

इसके बाद 2004 में नटवर लाल का नाम सामने आया। तब एक वकील ने कहा था कि नटवर लाल ने अपनी वसीयतनुमा फाइल उसे सौंपी है। कुछ लोगों का कहना है कि नटवर लाल की मृत्यु 2009 में हुई है, जबकि उसके पारिवारिक रिश्तेदार दावा करते रहे है कि नटवर लाल 1996 में ही मर चुका है। नटवर लाल की मृत्यु को लेकर कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिले है। ऐसे में इतिहास के इस सबसे बडे ठग ने अपनी मौत से भी लोगों को धोखा दिया।

 

 

 

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