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15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराना हर प्रधानमंत्री के लिए गौरव की बात होती है. लेकिन इसी गौराव के चलते अहंकारी भाजपा देश को आजाद कराने के लिए हर मंच से केवल हिन्दुओं को ही श्रेय देती नज़र आती है. ऐसे में हमारी आज की ये पोस्ट हर उस व्यक्ति के लिए है जो समझता है कि भारत केवल हिन्दुओं की वजह से आज़ाद हुआ है.

आजाद हिंद फौज के मेजर जनरल शाहनवाज खान को क्यों भुला दिया गया !

यूँ तो भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करवाने के लिए न जाने कितने देशभक्तों और सैनिकों ने अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन इन महान देशभक्तों में समय के साथ कुछ हिन्दूवादी ठेकेदारों ने जनरल शाहनवाज खान का नाम भुला दिया. जी हाँ वहीं शाहनवाज खान जो आजाद हिंद फौज के मेजर जनरल होने के साथ-साथ, महान देशभक्त, सच्चे सैनिक और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बेहद करीबियों में से एक थे.

बचपन से ही देशभक्त थे शाहनवाज

ब्रिटिश इंडिया में 24 जनवरी साल 1914 को जिला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में झंझुआ राजपूत कैप्टन सरदार टीका खान के घर जन्मे शाहनवाज खान एक सच्चे समाजसेवी और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ भी थे. चुकी शाहनवाज खान एक सैनिक परिवार में जन्में थे इसलिए शुरू से ही उनके मन में देशभक्ति थी.

1940 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक अधिकारी के तौर हुई थी नियुक्ति

प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पाकिस्तान में लेने के बाद सन 1940 में शाहनवाज ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक अधिकारी के तौर पर नियुक्त किये गये थे. जिस वक्त जनरल शाहनवाज ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए उस वक्त विश्व युद्ध चल रहा था जिसके चलते ही उनकी पहली तैनाती सिंगापुर में हुई.

सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर शाहनवाज आजाद हिन्द फौज में हुए शामिल

पहले विश्व युद्ध के दौरान जापानी फौज द्वारा ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैंकड़ों सैनिक जेल भेजे जा चुके थे. इसके चलते ही 1943 में नेता जी सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर आए और उन्होंने आजाद हिंद फौज की मदद से इन ब्रिटिश इंडियन आर्मी के बंदी सैनिकों को रिहा करवाया. इसी दौरान नेताजी के द्वारा दिया गया जोशीला नारा ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ सैकड़ों भारतियों के दिल पर इस कदर छाया कि शाहनवाज के साथ सैंकड़ों सैनिक आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गए और भारत को आज़ाद कराने के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने लगे.

उनकी देशभक्ति और नेतृत्व क्षमता देख खुद नेता जी भी हो गये थे प्रभावित

शाहनवाज खान की देशभक्ति और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए नेताजी ने उन्हें आरजी हुकूमत-ए-आजाद हिंद की कैबिनेट में शामिल किया. उसके बाद मानो उनकी देशभक्ति का जादू इस कदर छाया कि उन्हें पहले मांडले में तैनात सेना की टुकड़ी में कमांडर बनाया, उनके बाद नेता जी ने आजाद हिंद फौज की ही कमान जनरल शाहनवाज को सौप दी.

जब अंग्रेजों को भी आजाद हिंद फौज के आगे झुकना पड़ा था

फिर वो दौर आया जिसमें आजाद हिंद फौज के साथ मिलकर जनरल शाहनवाज खान ने ब्रिटिश आर्मी से लोहा लेना शुरू किया. इसी के चलते अंग्रेजी हकूमत ने नवंबर 1946 में मेजर जनरल शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल गुरुबक्श सिंह के खिलाफ दिल्ली के लाल किले में राजद्रोह का मुकदमा चलाया, लेकिन भारी जन सैलाब और सैकड़ों समर्थकों के चलते ब्रिटिश आर्मी को सभी आजाद हिंद फौज के अफसरों को महज जुर्माना लगाकर छोड़ना पड़ा.

आजाद हिंद फौज के बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस में रहते हुए भी दिया महत्वपूर्ण योगदान

साल 1946 में देश को आज़ाद कराने में अहम योगदान रखने वाली आजाद हिंद फौज तो समाप्ति हो गई लेकिन जनरल शाहनवाज खान, महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की प्रेरणा से इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गये. इस दौरान उन्होंने पार्टी में ही रहते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन वर्ष 1947 से 1951 तक बखूबी किया. इतना ही नहीं कांग्रेस के प्रति उनकी श्रद्दा इस कदर थी कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी वह 1977 से 1983 तक कांग्रेस सेवा दल के प्रभारी बने रहे.

पंडित नेहरु ने दी थी ‘खान’ की उपाधि

पंडित नेहरु द्वारा ‘खान’ की उपाधि से नवाजे जाने वाले जनरल शाहनवाज खान धर्म से मुस्लिम थे लेकिन उनका दिल हमेशा हिन्दुस्तान के लिए ही धड़कता था. जो लोग सत्ता में बैठकर आज मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बाते करते हैं वो ये शायद भूल रहे हैं कि जिन सैनानियों ने उन्हें आज़ादी दिलाई उसमें जितनी भूमिका हिन्दूओं की थी उतनी ही मुसलमानों की भी रही हैं.

लाल किले पर फहराया था पहला तिरंगा

जी हाँ, ब्रिटिश हुकूमत से देश को आज़ाद कर लाल किले पर पहला तिरंगा लहराने वाले शख्स जनरल खान ही थे. देश को आज़ादी दिलाने में उनका कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के पहले तीनों प्रधानमंत्रियों ने जब-जब लालकिले पर भाषण दिया तो उनका संबोधन जनरल शाहनवाज से ही शुरू हुआ.

लालकिले पर आज भी गूंजती है जनरल खान की बुलंद आवाज़

जानकारी के लिए बता दें कि, आज भी लालकिले पर रोज शाम छह बजे जो लाइट एंड साउंड का अदभुद कार्यकर्म होता है, उसमें नेताजी के साथ जनरल शाहनवाज की ही आवाज आज़ादी की दास्ताँ बयान करती है.

लालकिले के पास दफनाया गया

गौरतलब है कि जनरल खान की देशभक्ति को देखते हुए ही जब सन 1983 को उनका देहांत हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आग्रह पर ही उन्हें उनके घर मेरठ की बजाह दिल्ली में लालकिले के पास स्थित जामा मस्जिद के निकट पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया था.

निष्कर्ष:

आज भले ही सत्ता के कुछ ठेकेदार मंच से मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की शर्मनाक बाते करते हैं लेकिन वो शायद ये भूल जाते हैं कि उन्हें आज़ादी दिलाने में जितना योगदान एक हिन्दू का रहा है उतना ही जनरल खान जैसे सैकड़ों मुसलमानों का भी रहा है.

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