भारत के शीर्ष मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें साजिशन इतिहास से छुपाया गया

अंग्रेजो से आजादी की लड़ाई में भारत के सभी धर्म के लोगो ने खून बहाया है फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान हो, सिख या ईसाई | लेकिन दुःख की बात यह है की हम लोग अधिकतर उन स्वंत्रता सेनानियों को ही जानते है जिन्हें किताबो और इतिहास में जगह मिली |

सच्चाई इससे हट के है, आज़ादी की लडाई में मुस्लिम समुदाय में से सिर्फ अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या बहादुर शाह ज़फर का ही सहयोग नही था बल्कि इनकी संख्या इससे भी कहीं गुना ज्यादा है | आईये आपको रूबरू कराते है उन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों से जिन्होंने आज़ादी में अपना योगदान दिया |

शाह अब्दुल अज़ीज़ रह. का अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ फ़तवा

आपने किताबो में पढ़ा होगा की 1857 की मंगल पांडे की क्रांति अंग्रेजो के खिलाफ पहली लडाई थी लेकिन ऐसा नही है | पहली लडाई का बिगुल 1772 में ही शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ने अंग्रेजो के खिलाफ फूंका था | अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जेहाद के फ़तवे के ज़रिए उन्होंने कहा के अंग्रेज़ो को देश से निकाल बाहर करो और आज़ादी हासिल करो।


इस फ़तवे का नतीजा रहा कि मुसलमानों के अन्दर एक शऊर पैदा होना शुरू हो गया के अंग्रेज़ फ़क़त अपनी तिजारत ही नहीं चमकाना चाहते बल्कि अपनी तहज़ीब को भी यहां ठूंसना चाहते हैं।

स्वतंत्रता सेनानी अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी


इसके बाद एक ऐसे स्वंत्रता सेनानी का नाम आता है जिसने दिल्ली की जामा मस्जिद से अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जेहाद का फ़तवा दिया था। अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी ने इस फ़तवे के बाद बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और अज़ीम जंग-ए-आज़ादी लड़ी। अंग्रेज इतिहासकार लिखते हैं कि इसके बाद हज़ारों उलेमाओं को फांसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया गया। सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था। और बहुतों को काले पानी की सज़ा दे दी गई थी। अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई।

हैदर अली और टीपू सुल्तान की वीरता

अब जिनका नाम आता है वो है हैदर अली और टीपू सुल्तान | टीपू सुल्तान के बारे में हम में से कई लोगो ने पढ़ा भी होगा | टीपू सुल्तान वो शक्स थे जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक ख़तरे को समझा और उसका विरोध किया। टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसा योद्धा भी था जिसकी दिमाग़ी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। टीपू अपनी आख़िरी सांस तक अंग्रेज़ों से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए।

बहादुर शाह ज़फ़र

बहादुर शाह ज़फर का नाम आज न सिर्फ स्वतन्त्रता सेनानियों में लिया जाता है बल्कि उर्दू के कई लेखक और शायर उन्हें उनकी कविताओ के लिए भी पढ़ते है | बहरहाल स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी कविताओ ने शस्त्रों का काम किया था |


उनकी शायरी से अंग्रेजों के ख़िलाफ़ बग़ावत से उथल-पुथल मच गई।इस पहली जंग-ए-आज़ादी में हार के बाद अंग्रेज़ों ने उन्हें क़ैद कर बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया था, जहां जेल में उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफ़नाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने लिखा था –

कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीं भी न मिली कू-ए-यार में

ग़दर आंदोलन

आपने अब तक गाँधी जी के आन्दोलनों के बारे में ही अधिकतर पढ़ा होगा लेकिन एक आन्दोलन ‘ग़दर’ के नाम से भी हुआ जिसके संस्थापक भोपाल के बरकतुल्लाह थे | ग़दर पार्टी का हैड क्वार्टर सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया था |

ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफ़ल ग़दर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सज़ा दी गई। फ़ैज़ाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीक़ी ने जौनपुर के सैयद मुजतबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था।

ख़ुदाई ख़िदमतगार मूवमेंट


भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में ख़ुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया। वह एक ऐतिहासिक आन्दोलन था। विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ़्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी। उसके बाद उन्हें यातनाओं को झेलने की आदत सी पड़ गई। जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया।

सर सैयद अहमद ख़ान

सर सैयद अहमद ख़ान ने अलीगढ़ मुस्लिम आन्दोलन का नेतृत्व किया। वे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक काल में राजभक्त होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी थे। उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों का समर्थन किया। 1884 ई. में पंजाब भ्रमण के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए सर सैयद अहमद ख़ान ने कहा था कि, हमें (हिन्दू और मुसलमानों को) एक मन एक प्राण हो जाना चाहिए और मिल-जुलकर काम करना चाहिए।

यदि हम एक साथ होंगे तो एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक मददगार हो सकते हैं। अगर नहीं तो एक का दूसरे के ख़िलाफ़ होना दोनों का ही पूर्णतः पतन और विनाश कर देगा। इसी प्रकार के विचार उन्होंने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में भाषण देते समय व्यक्त किया था।

एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था कि, हिन्दू एवं मुसल्मान शब्द को केवल धार्मिक विभेद को व्यक्त करते हैं, परन्तु दोनों ही एक ही राष्ट्र हिन्दुस्तान के निवासी हैं। सर सैयद अहमद ख़ान द्वारा संचालित ‘अलीगढ़ आन्दोलन’ में उनके अलावा नज़ीर अहमद, चिराग़ अली, अल्ताफ़ हुसैन, मौलाना शिबली नोमानी इस आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता थे।

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