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कहने को तो देश में कई प्रधानमंत्री हुए.

देश की प्रगति ने सबने अपना अपना योगदान भी दिया लेकिन अगर किसी एक प्रधानमंत्री को वीरांगना की उपाधि दी जाए तो बिना किसी हिचक सबकी जुबान से एक ही नाम निकलेगा और वह नाम है इंदिरा गांधी का.

इंदिरा गांधी को त्याग, साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता है. आइए, आज जानते हैं इंदिरा जी के अनमोल विचारों को.

मुझे मार सकते हो पर विचारों को कैसे !

  1. इंदिरा जी कहती थीं कि कुछ लोग मुझे मारना चाहते हैं. कुछ लोग डरते हैं कि मेरे खिलाफ साजिशें रची जा रहीं हैं तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारों के विचारों और कर्मां में होगी, मेरे मरने में नहीं और अगर मैं मर भी गई तो मेरे खून का एक एक कतरा देश के काम आएगा.
  2. मेरे दादाजी पंडित मोतीलाल नेहरु मुझसे अक्सर कहा करते थें. दुनिया में दो प्रकार के लोग होते हैं. पहले वो जो काम करते हैं और दूसरे वो जो सिर्फ श्रेय लेते हैं. कोशिश करों की पहले वाले समूह में रहो क्योंकि वहां प्रतिस्पर्धा बहुत कम होती है.
  3. एकता और अखंडता की प्रबल समर्थक इंदिरा जी हमेशा कहा करती थीं कि बंद मुट्ठी से कभी हाथ नहीं मिलाया जा सकता. अर्थात् पांचों उंगलियों को बना कर बनी मुट्ठी से हाथ मिलाने अथवा मुकाबला करने का साहस किसी में नहीं होता.
  4. कर्म को प्रधान बताते हुए इंदिरा जी कहती थीं यदि कुछ करने में पूर्वाग्रह है तो चलिए अभी कुछ होते हुए देखते हैं. आप उस विशाल योजना को छोटे छोटे चरणों में बांट सकते हैं और पहला कदम अभी तुरंत उठा सकते हैं.
  5. भारत को हमेशा स्वाभिमानी राष्ट्र के रुप में कल्पना करने वाली इंदिरा गांधी के विचार थें कि एक देश की ताकत अंततः इसी बात में निहित है कि वो खुद क्या कर सकता है, इसमें नहीं कि वो औरों से क्या उधार ले सकता है.
  6. इंदिरा जी अक्सर कहा करती थीं कि किसी दीवार को तब तक न गिराओ, जब तक आपको यह पता न चलें कि ये दीवार खड़ी क्यों और किसलिए की गई थी.

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