क्या वजह है की भारतीय रेल आपको नहीं चुनने देता आपकी पसंदीदा सीट ?

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दूर-दराज के स्थानों पर जाने के लिए देश का आम आदमी ट्रेन से जाने का ही विकल्प चुनता है। ट्रेन में सफर करना तो काफी आसान है लेकिन इसकी टिकट लेना उतना ही मुश्किल। पहले समय में तो लोगों को दिन-रात भर लाइनों में खड़े होकर टिकट लेना पड़ता था। लेकिन आज ऑनलाइन का जमाना है। घर बैठे आप टिकट बुक करवा सकते हैं। लेकिन ये भी जितना आसान नज़र आता है। असल में उतना आसान है नहीं।

1. आसान नहीं है ट्रेन की कन्फर्म टिकट लेना

खासतौर पर गर्मी की छुटिट्यों और त्योहारों के समय कन्फर्म टिकट पाना काफी मुश्किल काम होता है। दो-तीन महीने पहले टिकट बुक करवाने वाले यात्रियों को भी वेटिंग में सफर करना पड़ रहा है। क्या आपने कभी नोटिस किया है की ट्रेन में आपको कभी अपनी मनपसंद सीट मिली हो।

2. हर यात्री चाहता है विंडो सीट लेना

बस हो या ट्रेन अधिकतर लोग यही चाहते हैं कि उन्हें विंडो सीट ही मिले, ताकि खिड़की से बाहर झांकते हुए वो सफर का पूरा आनंद ले सकें। लेकिन ट्रेन के मामले में सीट आपकी चॉइस पर निर्भर नहीं करता। दरअसल इसके पीछे की वजह ये है की ट्रेन बुकिंग के समय अपनी पसंद की सीट लेने का विकल्प नहीं होता है।

 

3. रेलवे में नहीं मिलती मनपसंद सीट

रेलवे में सीट बुकिंग के दौरान कई चीज़ें जाँची जाती है। आपको यह जानकर हैरान होगी की रेलवे का टिकट बुकिंग सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि वह सभी कोच में एक समान लोगों की ही बुकिंग करता है।

जानकारी के आपको बताते हैं की ट्रेन के हर कोच में 72 सीटें होती हैं और रेलवे का सॉफ्टवेयर सबसे पहले किसी भी यात्री को लोअर सीट अलॉट करता है और बैलेंस बनाने के लिए उसके बाद अपर सीट, मिडल सीट का अलॉटमेंट बाद में होता है।

4. सीटों का बैलेंस करना होता है जरूरी

इसलिए जब भी कोई यात्री आईआरसीटीसी के वेबसाइट के ज़रिए ट्रेन की बुकिंग करता हैं तो रेलवे का सॉफ्टवेयर पहले ये चेक करता है कि सभी कोच में एक समान संख्या में पैसेंजर्स हैं या नहीं और मिडल से होते हुए गेट के पास वाली सीट तक अलॉट की गई है या नहीं।

इस तरह सीट की अलॉटमेंट के पीछे का मकसद है की ट्रेन के सभी कोचों में सीटों का बैलेंस बना रहे। बाकी ट्रेन में कुछ ख़ास कोटा भी मौजूद होते हैं, जिसका इस्तेमाल खासतौर पर करने पर सीटों का आंवटन देखकर ही किया जाता है।


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