जानिए कैसे राजनीति से दूर रहकर भी देश की प्रभावशाली नेता हैं सोनिया गांधी - वायरल इन इंडिया - Viral in India - NEWS, POLITICS, NARENDRA MODI

जानिए कैसे राजनीति से दूर रहकर भी देश की प्रभावशाली नेता हैं सोनिया गांधी

वक्त की नज़ाकत को परखते हुए 'सक्रिय' सोनिया ने खेला ऐसे अपना पहला सियासी दांव कि बीजेपी चकमा ही खा गई

मंगलवार सुबह कर्नाटक मतगणना शुरू होते ही नतीजो की तस्वीरे पल-पल बदलती दिखी.

 

शुरुआत में कांग्रेस और भाजपा लगभग बराबर-बराबर सीटें पाते दिखे,

लेकिन 11 बजे के आसपास भाजपा की लीड बहुमत के आंकड़े 112 से भी आगे निकल गई.

फिर दोपहर एक बजे साफ होने लगा कि भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएगी क्योंकि उसके पास बहुमत का जादुई आकड़ा नहीं है.

स्तिथि को भापते हुए सोनिया गांधी ने दिखाई सक्रिय भूमिका

कांग्रेस नेताओं ने यह देखने के लिए आधा घंटे इंतजार किया कि कहीं आकड़े फिर बदल तो नहीं रहे.

जिसके बाद जैसे ही ये तस्वीर साफ़ हुई कि कांग्रेस और जद (एस) मिलकर बहुमत के आंकड़े के पार जा रहे हैं तो फिर वो हुआ जो शायद खुद बीजेपी भी नहीं सोच पाई.

जी हाँ उस स्तिथि में बिना देरी किया समय की गंभीरता को देखते हुए सोनिया गांधी ने सक्रीय होते हुए एक चौंकाने वाला फैसला लिया.

मतगणना के बीच ही सोनिया गांधी ने की थी देवगौड़ा से फ़ोन पर बात

बताया जा रहा हैं कि वो और कोई नही खुद सोनिया गांधी ही थी जिसने भाजपा का रास्ता रोकने के लिए जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा से फोन पर बात की.

इसी बातचीत के दौरान सोनिया गांधी ने तुरंत अपना अनुभव दिखाते हुए जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा से कहा कि उनकी पार्टी कुमारस्वामी को बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार करती है.

जिसपर देवगौड़ा ने भी सकारात्मक जवाब देते हुए गठबंधन के लिए हामी भरी.

सवा दो बजे लगी एतिहासिक समझौते पर मुहर

यही वो मोड़ था जब कर्नाटक की राजनीति में एक के बाद एक नाटकीय फेर-बदल का सिलसिला शुरू हुआ.

पार्टी सूत्रों की माने तो सोनिया ने अपनी ये बात पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर बंगलूरू पहुंचे गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत से भी साझा की.

जिसके बाद सोनिया गांधी के नेत्रित्व में सवा दो बजे कांग्रेस नेताओं ने कुमारस्वामी से बात कर गठबंधन के समझौते पर मुहर लगवा ली.

और ठीक 15 मिनट बाद कांग्रेस नेता राजभवन जाने के लिए निकल गए.

गोवा और मणिपुर की गलती नहीं दोहराना चाहतीं सोनिया गाँधी

इस पुरे सिलसिले के दौरान ये बात सामने आई कि सोनिया गांधी गोवा और मणिपुर जैसा स्थिति का सामना नही करना चाहती थी.

जिसके लिए ही उन्होंने तुरंत गठबंधन का फैसला लिया.

याद हो तो इन दोनों राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी,

लेकिन भाजपा ने रातों-रात दूसरी पार्टियों से गठबंधन कर सरकार बना ली और कांग्रेस को विपक्ष में बैठने को मजबूर कर दिया.

नतीज़ों से पहले ही सोनिया ने जेडीएस को कर लिया था गठबंधन के लिए तैयार

यही वजह थी कि इस बार कांग्रेस की ओर से जोड़तोड़ करने और सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए नतीजे आने का इंतजार ही नहीं किया गया.

लेकिन कांग्रेस नेताओं को राजभवन के गेट पर ही रोक दिया गया क्योंकि राज्यपाल वजुभाई बाला का कहना था कि सरकार बनाने का दावा तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही किया जा सकता है.

हालांकि कुछ समय बाद इस्तीफा देने पहुंचे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से राज्यपाल से इस मुद्दे को लेकर मुलाकात की.

सोनिया के ही चलते कांग्रेस और जद (एस) आए साथ

चुनाव से पहले जिस जद (एस) से गठबंधन के लिए कांग्रेस बिलकुल तैयार नहीं थी, उसी से हाथ मिलाते हुए सोनिया गांधी ने ही अपनी पार्टी को इसका राजनीतिक मतलब रुझान आने के बाद समझाया.

कांग्रेस जद (एस) के साथ सीटें साझा करने को तैयार नहीं थी लेकिन माना जा रहा हैं कि इसके पीछे भी सोनिया गाँधी का ही दिमाग हैं जिसे मंगलवार को कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने का एलान तक कर दिया.

नतीज़ों के बाद से सोनिया गाँधी की रणनीति पर ही कांग्रेस आगे बढ़ रही है

पार्टी नेताओं की माने तो जेडीएस के समर्थन को लेकर सोनिया गांधी शुरुआत से ही सक्रिय थी और वो खुद चाहती थी कि पार्टी जेडीएस का समर्थन करे.

यहां पर गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत बेंगलुरू में सोनिया गाँधी के कहने पर ही कैंप किए हुए हैं.

जो समय-समय पर सोनिया गाँधी की रणनीति पर फैसले लेते नज़र आ रहे है.

निष्कर्ष

ऐसे में ये कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि अगर सोनिया गाँधी नहीं होती तो शायद कर्नाटक में सरकार बनाने की राह बीजेपी के लिए कब की ही आसान हो गई होती.

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