अब मुस्लिम नेता शाहनवाज़ हुसैन को भी भाजपा ने लगाया किनारे, पार्टी ने कर दिया बर्बाद

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देश में जब भी कहीं किसी भी स्तर पर चुनाव होते हैं तो खुद को कद्दावर नेता हर राजनितिक पार्टी के सभी कार्यकर्ता सबसे ज़्यादा सक्रिय हो जाते हैं। हर नेता दिन रात पार्टी से टिकट मिल जाने के सपने आँखों में लिए घूमता है। टिकट की आस में पार्टी दफ्तर के चक्कर लगाते नेताओं को जब ये पता चलता है कि उनके हिस्से की मिठाई किसी और के मुंह में पड़ चुकी है तब इलाके की राजनीति में एक नया मोड़ आता है जिसे हृदयपरिवर्तन कहा जाता है।

अररिया लोकसभा सीट पर हाल ही में हुए उपचुनाव भी ऐसे ही हृदयपरिवर्तन की कहानी कहने को बेताब हैं। बीजेपी में टिकट नामी ये मिठाई काटने और बांटने का काम और अधिकार सिर्फ एक-दो लोगों के पास ही है ऐसे में मिठाई उसी को बांटी जाती है जो इन्हें किसी तरीके खुश कर दे न कि उसको जो पार्टी के लिए काम करता हो।

1. शाहनवाज़ हुसैन की उम्मीदों पर फिर पानी

अररिया के उपचुनावों में भी कुछ ऐसा ही हुआ कि मिठाई का थाल तो कटा लेकिन किसी और के घर जा बंटा, मिठाई के साथ ही साथ एक नेता का भी काटा गया और जिनका जिनका नाम है शाहनवाज़ हुसैन। अररिया लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव का ऐलान होते ही शाहनवाज हुसैन इसी उम्मीद में थे कि शायद अब उनके अच्छे दिन आ गए।

इसी चक्कर में साहब शाहनवाज पिछले 3-4 महीनों से अररिया को अपना दूसरा घर बैठे थे पर उम्मीदों पर पानी उस वक़्त फिर गया जब पार्टी हाईकमान ने टिकट प्रदीप कुमार सिंह को दे दी।

2. अररिया सीट से नहीं मिला टिकट

हालाँकि सिंह भी लोगों के प्रतिनिधि नहीं बन पाए लेकिन पार्टी के इस रवैय्ये से शाहनवाज़ हुसैन को झटका जरूर लग गया। खबर यह भी सामने आयी कि कि बीजेपी के कुछ बड़े नेता शाहनवाज हुसैन को अधिक महत्व नहीं देना चाहते हैं, इसलिए शाहनवाज हुसैन को अररिया से टिकट नहीं दिया गया अब ऐसे में जब हिंदुत्व के अजेंडे पर सरकार बनाने वाली पार्टी के लिए एक अल्पसंख्यक नेता काम करे और जब मिठाई कटे तो कहीं और ही बंटे तो आप समझ ही सकते हैं कि हृदय परिवर्तन होने वाला है।

3. बीजेपी से नाराज़ चल रहे शाहनवाज़ हुसैन

वैसे राजनितिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी के लिए काम करने वाले शाहनवाज़ हुसैन पर जन और कौम विरोधी सोच रखने का ठप्पा लग चुका है ऐसे में कोई ही पार्टी ऐसी होगी जो हुसैन साहब की गलतियों को माफ़ कर उन्हें अपने साथ लेगी।

निष्कर्ष:

बिहार की राजनीति में पिछले समय में आये मोड़ों को देखकर वोटर किसी नेता को वोट देने से पहले दस बार सोचने लगा है। ये ऐसा दौर है जिसमें वोटिंग मशीन लगे ‘नोटा’ बटन का निशान भी घिसने लगा है ऐसे में जनता के आक्रोश और भविष्य के समीकरणों को समझा जा सकता है।


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