नोट्बंदी में इस औरत के साथ जो हुआ खुदा करे वो किसी के साथ न हो

भारत के भीतर ऐसा दौर आया कि इसे भुलाया नहीं जा सकता । भाजपा राज में देश में ऐसे ऐसे काम हुए कि लोग इसे जहन से निकाल नहीं सकते हैं । फिर  वो चाहे नोट्बंदी हो या gst हो या फिर गाय को लेकर हुए मुद्दे हो । ऐसे ही हम आपको नोट्बंदी के समय से एक कहानी सुनाने जा रहे जो थोड़ी दुःख भरी है ।

क्या है कहानी

भारत के किसी काम में रहने वाले एक बुजुर्ग महिला को नोट्बंदी का  पता ही नहीं चला और उसके पास जो पुराने हजार और पांच सौ के नोट थे वो अब महज ४ लाख रुपया के कागज बचे हुए है । इस  महिला के पास अपना जीवन गुजारने को बस यही पूँजी थी ।उसने जहाँ तक हो सकता था हर जगह प्रयास किया कि उसके नोट बदल जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ । वो बीमार थी पैसे वही थे तो इलाज न करा पाई और उसकी मौत हो गयी ।

और जानिए उसकी कहानी

केरल में एक ज़िला है अर्नाकुलम. इस जिले के एक गांव में एक औरत रहती थी. नाम था सतीबाई. केरल के पशु चिकित्सा विभाग में नौकरी करती थीं. 20 साल पहले रिटायर हो चुकी थीं. अब वो 76 साल की बुज़ुर्ग महिला थीं. पेंशन आती थी और बैंक से जाकर ज़रूरत के पैसे निकाल लाती थीं.इस महिला की एक लड़की थी जो उसे जान से भी प्यारी थी । ऐसा इसलिए भी क्योकि उसका अपने के नाम पर बस एक यही लड़की थी ।

महिला संगम घाट के किनारे

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के मुताबिक जब सतीबाई अपनी नौकरी से रिटायर हुई थीं तो उन्हें 10 लाख रुपए मिले थे. जिसमें से उनके पास 4 लाख रुपए बचे थे. और वो घर में ही रखे थे. वो घर में अकेली रहती थीं. गांव में रहने वाले लोगों के साथ उनकी बनती नहीं थी. क्योंकि सतीबाई को लगता था कि लोग उनका पैसा हड़पना चाहते हैं. वो घर से बाहर कम ही निकलती थीं. इसके पीछे एक वजह उनका तनाव भी था. क्योंकि पति और बेटी की मौत के बाद वो थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई थीं.

फिर देश में नोट्बंदी का समय आया  और लोग एटीएम की कतार में या फिर बैंक में लगे हुए थे । कहा जा रहा था कि कालाधन वापस आएगा पर ऐसा कुछ न हुआ बल्कि समस्या ही झेलनी पड़ी आम लोगों को । लेकिन सतिबाई इस सबसे बिलकुल अंजान थी । वो पहले जैसे जिन्दगी बेखबर जी रही थी । जब वो जनवरी में घर से निकली और कुछ सामान खरीदने के लिए गयी तो दुकानदार ने पुराना 500 का नोट लेने से मना कर दिया । वो दूसरी दुकानों पर गयी तो वहां भी लोगों ने मना कर दिया । अब उसकी परेशानी और बढ़ गयी क्योकि उसके पास पूरे ४ लाख ऐसे रखे हुए थे ।

वो बैंक गयी पर वहां भी बदलने से लोगों ने मना कर दिया । उसको बताया गया कि अब बदलने की तारीख निकल गयी है । उसने बहुत गुस्सा किया,मिन्नत की लेकिन सब बेकार ।

गांव की पंचायत वार्ड सदस्य पोली टीपी ने द न्यूज़ मिनट को बताया कि हमने उनके पैसे बदलवाने के लिए एक एक्शन कमेटी बनाई थी. सभी दस्तावेज़ जुटाए और उन्हें लेकर चेन्नई भेजा, ताकि नए नोट बदले जा सकें. वहां पहुंचने पर भी मना कर दिया गया. कहा गया कि समय सीमा ख़त्म हो चुकी है. इसके लिए मंत्रालय से अनुमति की ज़रूरत है. मंत्रालय से संपर्क किया कुछ फायदा नहीं हुआ.

पोली टीपी ने बताया कि वो हार्ट और किडनी की मरीज़ थीं. कुछ हफ्ते पहले हम उन्हें केयर होम ले गए थे. वो बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं. हम उनके साथ ही थे, जब उन्हें हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया. उनका अर्नाकुलम जनरल हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था. लेकिन बीमारी की वजह से 17 अगस्त की रात को उनकी मौत हो गई.

अगर नोट बदल गए होते तो शायद उनको और बेहतर इलाज मिल सकता था. बल्कि पुलिस ने छापेमारी करके उस औरत के पुराने नोट सीज़ कर दिए थे. ये छापेमारी पंचायत सदस्यों के सामने की गई थी. नोट प्लास्टिक में बंधे हुए अलमारी में रखे मिले थे.

बुज़ुर्ग औरत की ये कहानी नोटबंदी के नाम बनकर रह गई. पता नहीं इस कहानी को कोई किसी को सुनाएगा या नहीं. या उसी तरह रह जाएगी, जैसे ये बुज़ुर्ग औरत नोटबंदी के फैसले से अनजान रह गई थी. वो भी उस ज़माने में जब न्यू इंडिया की बात हो रही है. सुनाते रहिए अब लोगों को इस बुज़ुर्ग की कहानी. करते रहिए शेयर. जोड़ते रहिए काले धन के आंकड़े कि कितना बाहर आ गया. अब ये बुज़ुर्ग इस दुनिया में नहीं रही.

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