आखिर कौन है अहमद पटेल जिन्होंने अमित शाह को दिन में तारे दिखा दिए ?

By:- Viral in India Team on

‘अहमद पटेल को हराना है अहमद पटेल को हराना है’ इसकी गूँज शायद आपके कानो में तब से पड़ रही होगी जब से गुजरात राज्यसभा चुनावों की तारिख तय हुई या तब से जब अहमद पटेल ने कांग्रेस का मोर्चा इस चुनाव में संभाला l बीजेपी ने लाख प्रयास किये की वो किसी तरह से कांग्रेस को इस चुनाव जीतने से रोके मगर पासा पलटने में ज्यादा देर नहीं लगी और एक बार फिर अहमद पटेल राज्यसभा पहुचने में कामयाब रहे |

बीजेपी क्यों इतनी व्याकुल थी अहमद पटेल को रोकने के लिए

अहमद पटेल कांग्रेस पार्टी का वो इक्का है जो पूरे देश के मुस्लिम वोट को जेब में लेकर चलता है | चुनाव के दौरान बीजेपी नहीं चाहती थी अहमद पटेल किसी भी कीमत पर ये चुनाव जीते क्योंकि गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल उस विडियो को उजागर करने की बात कर रहे थे जिसके कारन वोट रद्द किये गये और उनका तीसरा कैंडिडेट बलवंत सिंह राजपूत हार गया | कांग्रेस का आरोप था की उनकी पार्टी के विधायक ने दगा बाजी की, विधायक राघवजी पटेल और भोला गोहिल ने वोट डालने के बाद अपने बैलट भाजपा प्रतिनिधि को भी दिखाए थे जो की नियमो के खिलाफ है |

नियमों के मुताबिक, वोट करने वाले विधायकों को अपने बैलट सिर्फ़ अपनी पार्टी के आधिकारिक प्रतिनिधि (चुनाव एजेंट) को दिखाने होते हैं | बहरहाल अहमद पटेल ने ट्विटर पर ‘सत्यमेव जयते’ लिख कर अपनी जीत का एलान किया और विधायको का भी धन्यवाद किया | लेकिन इन चुनावी नतीजो ने अहमद पटेल की प्रोफाइल पर नज़र डालने में ज़रूर मजबूर कर दिया क्योंकि इस जीत ने बीजेपी को हिला कर रख दिया है |

अहमद पटेल लगातार तीन पीढियों से है कांग्रेस में है और मंत्रीपद को अहमियत न देते हुए पार्टी के प्रति निष्ठ्वान रहे

अहमद पटेल इंदिरा गाँधी के वक़्त से कांग्रेस में है और 1977 के आम चुनावों में जब कांग्रेस को हार हुई थी तब अहमद उन नेताओ में से थे जो संसद पहुचने में कामयाब रहे थे | 1980 के चुनाव में जब इंदिरा ने वापसी की तब उन्होंने अहमद को कबिनेट में शामिल होने का प्रस्ताव दिया मगर अहमद ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए पार्टी को चुना यानी संगठन में काम करने का मन बनाया |

कुछ ऐसा ही वाकया उन्होंने राजीव गाँधी के वक़्त भी दहराया जब 1984 के चुनाव के बाद राजीव ने उन्हें मंत्रिपद देना चाहा तो उन्होंने फिर से पार्टी में जुटे रहने की मांग की | और जिसका फायदा आज सोनिया गाँधी को मिल रहा है | उस दौरान उन्होंने यूथ कांग्रेस का नेशनल नेटवर्क तैयार किया | राजीव से उनके मतभेद होने के बाद भी आज भी जब उनके बारे में बात करते है तो आँखों में आंसू छलक आते है |

सांसद से सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार तक, कुछ इस प्रकार है अहमद पटेल का राजनीतिक सफ़र

आज भी जब सोनिया गाँधी कह दे की विचार कर के बताउंगी तो समझ जाए की अहमद पटेल से चर्चा होने पर ही उस फैसले पर मोहर लगेगी | अहमद ने बेहद अहम रोल निभाया है सोनिया गाँधी के पार्टी संभालने के बाद से लेकिन इसके लिए अहमद ने काफी लम्बा सफ़र तय किया है | पटेल ने अपना चुनाव 1977 में भरूच से लड़ा था जिसमे कुल 62,879 वोट मिले और वो जीत गये | 1980 में एक बार फिर से इसी जगह से चुनाव लड़े और 82,844 से जीत हासिल की | उसके बाद लोकसभा चुनाव में 1984 के दौरान 1,23,069 वोटो से जीत दर्ज करायी | 2001 में अहमद सोनिया गाँधी के राजनीतिक सलाहकार बन गये थे और तब से अपनी गाँधी परिवार के प्रति निष्ठां और सूझ बूझ के लिए जाने जाते है |

नरेन्द्र मोदी ने अहमद पटेल को  बताया अपना ख़ास मित्र मगर अहमद ने कर दिया इनकार

एक बार एक चुनावी रैली में नरेन्द्र मोदी ने अहमद पटेल को ‘अहम मियाँ पटेल’ कह कर पुकारा था जो की बाद में विवाद का विषय बन गया था | इस पर मोदी ने सफाई पेश करते हुए कहा की वो शब्द उन्होंने प्यार से प्रयोग किये थे मगर कहने वाले कहते है की ये बेजीपी का तंज था कांग्रेस पर क्योंकि वो एक मुस्लिम को गुजरात की सीएम बनाना चाहती थी | एक इंटरव्यू में मोदी ये भी कहते है की ‘किसी जमाने में वो और अहमद अच्छे दोस्त हुआ करते थे, एक-दूसरे के घर आना-जाना था मगर अब तो अहमद फ़ोन भी नहीं उठाते’

इस पर अहमद कहते है की “मैं मोदी से सिर्फ एक बार 1980 में मिला था | उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जानकारी में मेरी ये मुलाकात हुई थी | 2001 में मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से मैंने उनके साथ एक कप चाय भी नहीं पी है |”

--- ये खबर वरिष्ठ पत्रकार के द्वारा लिखी गयी है वायरल इन इंडिया न्यूज़ पोर्टल के लिए

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