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जैसे जैसे लोकसभा चुनाव करीब आता जा रहा है, भाजपा की परेशानियां बढ़ती जा रही है. केंद्र और असम की सत्ता में भाजपा की साझीदार असम गण परिषद ने एनडीए से नाता तोड़ लिया है.

उम्मीद जताई जा रही है कि असम गण परिषद अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए का हिस्सा बन सकती है. असम गण परिषद के वरिष्ठ नेताओं ने ऐसे ही संकेत दिए है.

असम में नफरत फैलाने का लगाय आरोप

असम गण परिषद ने भारतीय जनता पार्टी पर राज्य में अपनी सियासी रोटी सेंकने के लिए नफरत की राजनीति को करने का आरोप लगाते हुए अपने सालों पुराने रिश्ते को विराम देने की घोषणा कर दी है.

पार्टी के अध्यक्ष और असम सरकार में मंत्री अतुल बोरा ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से बैठक करने के उपरांत गठबंधन तोड़ने की जानकारी दी.

नागरिकता बिल मुद्दे पर हुआ गतिरोध

अतुल बोरा ने बताया कि नागरिकता बिल एक विवादित मसला है. यह बिल में पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता देने के लिए लाया गया है.

हमने केंद्रीय गृह मंत्री से इसकी तार्किकता पर सवाल पूछा तो उन्होंने साफ कहा कि अब हम कोई बात नहीं कर सकते. यह बिल कल लोकसभा में पारित किया जाएगा.

ऐसे में अब हम इस गठबंधन में बने नहीं रह सकते हैं. हम भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अपने संबंध यहीं खत्म करते हैं.

असम गण परिषद का इतिहास

असम गण परिषद का गठन 1985 में ऐतिहासिक असम समझौते के बाद हुआ. स्थापना के बाद यह पार्टी तेजी से असम की राजनीति में मजबूत हुई.

इसके अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत राज्य के सीएम भी रह चुके हैं. इसके बाद अगप 1985 से 1989 तक एवं फिर 1996 से 2001 तक असम की सत्ता में भी रह चुकी है.

असम विधानसभा में इसके 14 विधायक हैं. लोकसभा में इसके 01 और राज्यसभा में 01 सांसद हैं.


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